Friday, 3 April 2015

गोवा की वह भटकती आत्मा

आधे मिनट में ही खिड़की की मच्छर जाली से बाहर किसी की साँसों की आवाज़ सुनाई दी और फिर से कोई दबे पाँव खिड़की को पार कर गया। अंदर लाईट जल रही थी। इसलिए बाहर के अँधेरे में कुछ भी नहीं दिख रहा था। मैंने कम्प्यूटर से नज़र हटाये बिना उस आहट के प्रति सजग हो गया था। आहट इतनी स्पष्ट थी कि एक बार तो मेरे शरीर में झुरझुरी सी दौड़ गई। मैंने उसी समय उस आहट से निपटने का मन बना लिया। धीरे से उठा और अंदर की लाईट बंद कर ली। जिससे मेरी किसी हरकत का पता बाहर वाले को न लगे। अंदर अँधेरा होने पर मै उठा और दरवाजे तक दबे पाँव गया। चटकनी हौले से खोला और अचानक दरवाजा खोल कर बाहर आ गया। बाहर धुप अँधेरा था। ऊपर से कम्प्यूटर स्क्रीन पर घंटों आँखें गड़ाए होने के कारण आँखों के आगे चमकीला धब्बा सा बन गया था। मैं कुछ भी नहीं देख पा रहा था। चूंकि आहट आवास के बगल वाली तरफ की खिड़की के पास थी इस लिए मै अँधेरे में अपनी आँखे फाड़े बगल के कनेर के पेड़ के झुरमुट हटाते हुए गौर से देखने का प्रयास किया। आप यकीन मानिए जो मंज़र था उसे देख कर कोई भी कमज़ोर दिल का इंसान गश खा कर गिर सकता था। मुझे हल्का हल्का दिखने लगा था। मैंने देखा कि बड़े बड़े बाल कन्धों पर बिखरायेए कुर्ते पायजामे में एक साया दीवार से सटा। दीवार के मोड़ के कोने में चुपचाप दोनों हाथ ऊपर उठाये खड़ा था। इतना देखते ही एक बार तो जैसे बिजली सी कौंध गयी पूरे शरीर में। सेकेंड के पौने हिस्से में एक एक रोम सिहर गया। अगले ही पल मैंने अपने आपको संभला और थोड़ा और नज़दीक गया। डाट कर पूछा- कौन है? साया बिना  हिलेडुले चुपचाप  खड़ा रहा। मैंने एक-दो कदम और बढ़ा और फिर चीखा कौन है उधर? अब मेरी और उसकी दूरी पांच फिट की रही होगी। अचानक साया उछला और मेरे एकदम पास आ कूदा और मेरी आँखों में घूरते हुए स्त्री आवाज़ में बोला- मैं भटकती आत्मा हूँ। आप अंदाज़ा लगाइए कि ऐसे में किसी की क्या हालत हो सकती है। मैं भी फुर्ती से एक कदम पीछे हटते हुए अपने आप को हर परिस्थिति से निपटने के लिए तैयार कर चुका था। मैंने फिर पूछा- यहाँ क्यों आई हो? आत्मा मुझे घूरती रही फिर रहस्यमय आवाज़ में बोली- मेरे गुरु का आदेश था। मैं इधर से गुजर रही थी। पेड़ की पत्तियां छूते ही मुझे पता चल गया कि कमरे में कुछ हो रहा है। अब मैं अपने आपको कुछ संभाल चुका था। मैं  आगे बढ़ा और आत्मा की कलाई पकड़ ली और लगभग घसीटते हुए उसे झाडि़यों में से ले आया जहाँ इतनी रोशनी थी कि देखा जा सके। देखा तो पाया कि इस भटकती आत्मा की  उम्र लगभग पच्चीस से तीस साल की रही होगी। सफ़ेद कुर्ता-पायजामा, गंदे और बिखरे हुए बाल के साथ साथ खड़ी और अच्छी हिंदी में बात करती हुई आत्मा के बारे में तय हो चुका था कि यह इंसानी शरीर ही है। उसके बाद मै कुछ पूछता उसका ऊल जलूल उत्तर देती। मुझे झुंझलाहट में गुस्सा आ गया और मैंने एक तमाचा उसके गाल पर रसीद कर दिया तमाचा खा कर काफी देर तो उसकी आँखों के सामने अँधेरा छा गया और फिर जब बोली तो कुछ इस दुनिया जैसे अंदाज़ में मैंने अब भी उसकी कलाई जोर से पकड़ रखी थी। कुछ सोच कर उसे रोशनी में देखने के लिए उसे  लगभग दो सौ फुट दूर आंटी के घर के सामने तक ले गया। आंटी बाहर ही सो रही थीं। मेरे बुलाने पर बाहर की लाईट जलाई तो वो भी अचंभित हो गयीं कि रात दो बजे मेरे साथ ये कौन थी। फिर पूछताछ का दौर चला। आत्मा जी अच्छी खासी हिंदी बोल रही थी। अंग्रेजी के शब्दों की भी जानकारी थी। उसने अपना कुठ नाम भी बताया था। इंदौर की रहने वाली थी। उसने बातचीत के दौरान कई बार आंटी से पूछा कि बताओ इसने मुझे मारा क्यों ?
अब स्पष्ट हो चुका था कि उस लड़की का मानसिक संतुलन ठीक नहीं था।  यह जान लेने पर मुझे भी ग्लानि होने लगी। उसे समझाने बुझाने का प्रयास भी किया लेकिन वो तो अपनी धुन में थी। मैंने सोचा उसे पुलिस के हवाले कर दूं। हो सकता है किसी की बेटी हो अपने घर पहुच जाय, लेकिन उसने बताया पुलिस वाले ही तो उसे लाए हैं यहां। मेरे लाख कहने के बावजूद आंटी ने मुझे उसे छोड़ने नहीं जाने दिया और खुद ही हाथ पकड़ कर उसे कालोनी के मेन गेट के बाहर छोड़ आईं।

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